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श्री राम का जन्म धर्म की स्थापना,सज्जनो की रक्षा,मानव समाज को आदर्श जीवन का मार्ग दिखाने के लिए हुआ था: कथा वाचिका प्रतिभा

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(राम कथा का तीसरा दिन)

श्रावस्ती। श्री राम जी का जन्म धर्म की स्थापना, सज्जनो की रक्षा और मानव समाज को आदर्श जीवन का मार्ग दिखाने के लिए हुआ था। उक्त विचार श्री धाम वृन्दावन से आई हुई कथा वाचिका प्रतिभा मिश्रा ने तीन शिवाला मन्दिर पर हो रहे श्री राम कथा के तीसरे दिन भक्तों को भगवान श्री राम के जन्म के कारण का रसपान कराते हुए कही।

कथा वाचिका ने बताया कि वैसे तो जय विजय के उद्धार के लिए भगवान ने इस पृथ्वी पर जन्म लिया था। उन्होंने बताया कि एक बार की बात है जय और विजय भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम के द्वारपाल थे। वे अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करते थे।एक दिन सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार भगवान विष्णु के दर्शन के लिए वैकुण्ठ पहुँचे।

वे बालकों के समान दिखाई देते थे, लेकिन महान ब्रह्मज्ञानी ऋषि थे।जय और विजय ने उन्हें पहचान नहीं पाया और बिना अनुमति के भीतर जाने से रोक दिया। इससे चारों कुमारों को लगा कि द्वारपालों में अहंकार आ गया है।


उन्होंने क्रोधित होकर शाप दिया कि वे वैकुण्ठ से पृथ्वी पर जाकर असुर योनि में जन्म लें।तभी भगवान विष्णु स्वयं वहाँ आए उन्होंने कुमारों का सम्मान किया और जय-विजय से कहा कि ऋषियों का शाप अवश्य फलित होगा। भगवान ने उन्हें दो विकल्प दिए—सात जन्म तक भगवान के भक्त बनकर पृथ्वी पर रहना, यातीन जन्म तक भगवान के शत्रु बनकर जन्म लेना और फिर वैकुण्ठ लौट आना।

कथा वाचिका ने बताया कि जय और विजय ने भगवान से शीघ्र मिलने की इच्छा से तीन जन्म शत्रु रूप में लेने का विकल्प चुना।उनके तीन जन्म इस प्रकार हुए—हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु —जिनका वध भगवान के वराह और नरसिंह अवतार ने किया।रावण और कुंभकर्ण जिनका वध श्रीराम ने किया।शिशुपाल और दन्तवक्र जिनका वध श्रीकृष्ण ने किया रावण ने कठोर तप से वरदान प्राप्त कर देवताओं,दानवों और यक्षों को पराजित कर दिया था।

भगवान विष्णु ने मनुष्य रूप में श्रीराम के रूप में अवतार लिया।जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ा और ऋषि-मुनियों के यज्ञ बाधित होने लगे,तब भगवान ने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया।कथा वाचिका ने बताया कि मर्यादा का आदर्श स्थापित करना श्रीराम ने आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श मित्र और आदर्श राजा बनकर मानव जीवन के लिए सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किए। इसी कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है।

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